शोध सार आलख- पकरति कवि समितरानदन पत जी क परकति क आलिगन म आबदध हाकर नारी क रप वभव को भी ठकरा दिया विशव कनव जान कितन कवियो न परकति का चितरण अपन कावय म किया ह। किनत परकति क परति जसा गहरा अनराग इस महाकवि का परिलकषित हआ ह वसा हम किसी अनय म दषटिगोचर नही होता। परकित उनक लिए कावय की वसत और उनकी साज-सजजा का साधन ही नही, अपति उनकी कावय पररणा का सतरोत भी रही ह। उनहान सपषट शबदो म सवीकार किया ह कविता करन की पररणा मझ सबस पहल परकति निरीकषण स मिली ह। जिसका शरय मरी जनम-भमि करमाचल परदश को ह। कवि जीवन स पहल भी मझ याद ह, म घणटो एकानत म बठा, पराकतिक दशया को एक टक दखा करता था और कोई अजञात आकरषण मर भीतर एक अवयकत सौदरय का जाल बनकर मरी चतना को तनमय कर दता था। जब कभी म आख मदकर लटता था तो वह दशयपट चपचाप मरी आखा क सामन घमा करता था और यह शायद पवरत-पारनत क वातावरण ही का परभाव ह कि मर भीतर विशव और जीनस क परति एक गमभीर आशचरय की भावना, पवरत की तरह निशचय रप म अवसथित ह।